एक मां जब अपने बच्चे पर आई मुसीबत देखती है, तो वह किसी भी हद तक जाकर उसे बचाने की कोशिश करती है। ‘गांधारी’ की कहानी भी एक ऐसी ही मां की है, जो अपनी बेटी को वापस पाने के लिए हर मुश्किल से लड़ने को तैयार है। फिल्म में तापसी पन्नू मुख्य भूमिका में हैं।
फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि मेकर्स ने दर्शकों का समय बर्बाद किए बिना कहानी को सीधे उसके मुख्य मुद्दे यानी चाइल्ड ट्रैफिकिंग पर ला दिया है। शुरुआती 4-5 मिनट में ही साफ हो जाता है कि कहानी एक ऐसे मां-बाप की है, जिनकी बेटी मिष्टी का अपहरण हो गया है। तापसी के पति की भूमिका ईश्वाक सिंह ने निभाई है।
फिल्म की कहानी कनिका ढिल्लों ने लिखी है और इसका निर्देशन देवाशीष मखीजा ने किया है। लगभग दो घंटे की इस फिल्म की शुरुआत काफी तेज है और कहानी तुरंत दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेती है। हालांकि, सेकंड हाफ और खासकर क्लाइमैक्स कुछ जगहों पर जरूरत से ज्यादा खिंचा हुआ महसूस होता है।
फिल्म की कहानी पश्चिम बंगाल के एक शहर जॉयपुरा में सेट है। देवाशीष मखीजा का बचपन कोलकाता में बीता है, जिसका असर फिल्म में पश्चिम बंगाल के माहौल और जमीनी रंग को देखकर साफ नजर आता है। खास बात यह है कि जॉयपुरा फिल्म में सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक किरदार की तरह महसूस होता है।
कहानी में ब्लैक होल गैंगहै, जो छोटे बच्चों का अपहरण कर उनकी तस्करी करती है। अपनी बेटी के गायब होने के बाद तापसी का किरदार उसी शहर में रहकर अपनी बेटी को वापस लाने के लिए पूरी गैंग से भिड़ जाता है।
कहानी में एक दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब बेटी के गायब होने वाले दिन ही तापसी के किरदार के सिर पर चोट लगती है और उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। इसके बावजूद वह अपनी इस कमजोरी को अपनी ताकत बनने देती है और बेटी को खोजने के लिए संघर्ष जारी रखती है।
फिल्म में प्रशांत नारायण मुख्य विलेन के किरदार में नजर आते हैं। वहीं पुलिस अधिकारी की भूमिका में जतिन सरना, इसके अलावा मीता वशिष्ठ, स्वस्तिका मुखर्जी और चंदन रॉय ने भी अपने-अपने किरदारों में प्रभाव छोड़ा है। सभी कलाकारों का अभिनय फिल्म की मजबूत कड़ी है।
फिल्म में क्या अच्छा लगा, क्या नहीं?
फिल्म का सेटअप शानदार है। तापसी पन्नू और बाकी कलाकारों की एक्टिंग प्रभावशाली है। तापसी के एक्शन सीक्वेंस भी अच्छे हैं और कहानी की शुरुआत काफी दमदार तरीके से होती है।
लेकिन फिल्म में इतने सारे टर्न, ट्विस्ट और सस्पेंस हैं कि कहीं-कहीं कहानी खुद ही उनमें उलझती हुई नजर आती है। एक मां के अपनी बेटी को खोने का दर्द और उसे वापस पाने की बेचैनी फिल्म का सबसे मजबूत इमोशनल पहलू हो सकता था, लेकिन कई ट्विस्ट और सस्पेंस के बीच वह भावना कहीं दब जाती है। नतीजा यह होता है कि दर्शक उस दर्द को उतनी गहराई से महसूस नहीं कर पाता, जितनी उम्मीद की जाती है।
म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर की बात करें तो दोनों ठीक-ठाक हैं और कहानी को सपोर्ट करते हैं, लेकिन ऐसा कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ते जो फिल्म खत्म होने के बाद याद रहे।
गांधारी’ नाम क्यों?
फिल्म का टाइटल अपने आप में काफी दिलचस्प है। पौराणिक कथा में गांधारी ने अपने पति धृतराष्ट्र का साथ देने के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली थी। वहीं फिल्म में एक मां की आंखों की रोशनी चली जाती है, लेकिन वह इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने देती।
यही फिल्म का सबसे खास पहलू है—जब एक मां की आंखों की रोशनी चली जाती है, तब भी अपने बच्चे को बचाने की उसकी इच्छाशक्ति कमजोर नहीं होती।
कुल मिलाकर, ‘गांधारी’ का कॉन्सेप्ट और सेटअप मजबूत है। तापसी पन्नू का अभिनय और फिल्म का वातावरण प्रभावित करता है, लेकिन जरूरत से ज्यादा ट्विस्ट और लंबा क्लाइमैक्स फिल्म के इमोशनल इम्पैक्ट को थोड़ा कमजोर कर देते हैं।
हमारी रेटिंग: ⭐⭐½/5
‘गांधारी’ को हम 5 में से 2.5 स्टार देंगे।







