नाना पाटेकर का वह बेहद भावुक और बेबाक बयान, जिसमें उन्होंने शोहरत से दूर शांति की चाहत और समाज में बढ़ती दूरियों पर अपना दर्द बयां किया था।
Nana Patekar philosophy : पर्दे पर अपनी कड़क आवाज, दमदार अभिनय और बेबाक अंदाज से सिनेमाघरों की गूंज बढ़ा देने वाले नाना पाटेकर असल जिंदगी में लाइमलाइट और दिखावे की दुनिया से बहुत दूर रहना चाहते थे। अपनी शर्तों पर जीने वाले इस दिग्गज अभिनेता ने एक बार अपने दिल का गहरा दर्द बयां करते हुए कुछ ऐसी बातें कही थीं, जो झकझोर कर रख देती हैं। शोहरत की चकाचौंध से उपजी कोफ्त और समाज में बढ़ती दूरियों को लेकर नाना का वह दर्द आज उनके जाने के बाद और भी ज्यादा प्रासंगिक और भावुक हो गया है।
“मैं चाहता हूँ ऐसी जगह जाकर रहूँ, जहाँ मुझे कोई कुछ पूछे ना…”
भीड़भाड़, कैमरों के फ्लैश और लगातार सवालों से घिरे रहने वाली जिंदगी से तंग आकर नाना पाटेकर ने एक बार सुकून भरी जिंदगी की इच्छा जताई थी। उन्होंने अपने उस दर्द और चाहत को खुलकर सामने रखते हुए कहा था: “मैं चाहता हूँ कि मैं कहीं ऐसी जगह जाकर रहूँ कि जहाँ मुझे कोई कुछ पूछे ना मैं पढ़ता रहूँ या मैं अगर चाहूँ तो लिखता रहूँ या वहाँ के लोगों से रिश्ता बना दूं मैं… कितने तो लोग जुड़ पाएंगे जो प्राणी है भाई!
फिर उसके बाद ये 56 पे जानी है, उठा के ले जाएंगे बाद में… उतने तेरे रिश्ते बना लूंगा मैं। अब ये इससे बड़ी कोफ्त हो रही है यार! हमारे इर्द-गिर्द जो चलता है ना वो, बड़ी तकलीफ होती है अब।”यह पंक्तियां बयां करती हैं कि कैसे एक बड़ा सुपरस्टार भी अंततः साधारणता, शांति और सच्चे इंसानी जुड़ाव की तलाश में रहता था, जहां दिखावे का कोई स्थान न हो।
“ये सिख है, हिंदू है… ऐसे थे नहीं हम लोग”
सिर्फ एकांत की चाहत ही नहीं, बल्कि समाज में जाति, धर्म और पहचान के आधार पर बढ़ती दूरियों और बंटवारे ने भी नाना पाटेकर के संवेदनशील मन को बहुत आहत किया था। समाज के बदलते ताने-बाने पर बात करते हुए उन्होंने बड़े ही दर्द भरे शब्दों में कहा थाl
“ये साफा पहना है तो ये सिख है। ये कोई हिंदू है। मैं जाट हूँ। ये ब्राह्मण है। दलित है… ऐसे थे नहीं हम लोग! अच्छे थे, जैसे भी थे। सभी वर्ण तो साबुत थे वहाँ सब जगह, लेकिन हम साथ में थे।” उनका यह बयान उस पुरानी, मिली-जुली और आपसी भाईचारे वाली संस्कृति की याद दिलाता है, जहां इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके इंसान होने से होती थी।
एक फकीर मिजाज इंसान की असली दास्तान
नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता या सेलिब्रिटी नहीं थे; वे एक ऐसे पारखी और संवेदनशील इंसान थे जो समाज की हर विसंगति को अपने भीतर महसूस करते थे। शोहरत की बुलंदियों पर रहकर भी साधारण जीवन जीने वाले और मानवीय रिश्तों की असल कीमत को समझने वाले नाना पाटेकर के ये विचार हमेशा यह याद दिलाते रहेंगे कि वे कला के साथ-साथ एक बेहद सच्चे और संवेदनशील दिल के मालिक थे।






